“दो पहाड़, घना जंगल और अटूट आस्था,मां कोटमहिन के दरबार में उमड़ा जनसैलाब, ‘बीमारी विदाई’ की परंपरा बनी चर्चा का केंद्र”

“दो पहाड़, घना जंगल और अटूट आस्था,मां कोटमहिन के दरबार में उमड़ा जनसैलाब, ‘बीमारी विदाई’ की परंपरा बनी चर्चा का केंद्र”
सीधी जिले के कुसमी वनांचल में स्थित संजय टाइगर रिजर्व के बीचो-बीच कोटमा पहाड़ पर विराजमान मां कोटमहिन का दरबार इन दिनों आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है। चैत्र नवरात्र की सप्तमी पर हजारों श्रद्धालुओं ने कठिन रास्तों को पार करते हुए मां के दर्शन किए। दो पहाड़ों और घने जंगल के बीच स्थित इस धाम तक पहुंचना आसान नहीं, लेकिन भक्तों की श्रद्धा हर कठिनाई पर भारी पड़ती नजर आई।
बताया जाता है कि पहले मां कोटमहिन गुफा के अंदर विराजमान थीं, जहां श्रद्धालु सीधे गुफा में प्रवेश कर दर्शन किया करते थे। लेकिन करीब 30 साल पहले गुफा के बीचों-बीच एक विशाल पत्थर गिर गया, जिससे रास्ता पूरी तरह बंद हो गया। इसके बाद से श्रद्धालु गुफा के अंदर नहीं जा पाते और अब बाहर से ही गुफा के द्वार पर पूजा-अर्चना कर माता के दर्शन करते हैं। इसके बावजूद आस्था में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
इस बार नवरात्रि में मां कोटमहिन की पूजा के साथ एक अनोखी परंपरा भी चर्चा में है“बीमारी को गांव से जंगल भेजने” की मान्यता। स्थानीय आदिवासी समाज के अनुसार, जब भी किसी गांव में बीमारी फैलती है, तो विशेष पूजा-अर्चना के साथ मुर्गी या बकरे के माध्यम से उस बीमारी को एक गांव से दूसरे गांव स्थानांतरित किया जाता है और अंततः जंगल की ओर विदा कर दिया जाता है। ग्रामीणों का दावा है कि यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है और आज भी लोग इस पर गहरा विश्वास रखते हैं।
कुसमी के राजेंद्र प्रसाद विश्वकर्मा बताते हैं, “माता का प्रताप बहुत बड़ा है। जब भी गांव में कोई बीमारी फैलती है, तो माता की स्थापना कर पूजा की जाती है और फिर उस बीमारी को दूसरे गांव की ओर विदा किया जाता है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और माना जाता है कि अंत में बीमारी जंगल में चली जाती है और वापस नहीं लौटती।”
वहीं श्रद्धालु रामकेश द्विवेदी कहते हैं, “माता का स्थान बहुत प्राचीन है और करीब 15-16 गांवों की यह कुलदेवी हैं। नवरात्रि में हर घर में माता विराजमान होती हैं और पूरे 9 दिन पूजा और भंडारा चलता है। सबसे खास बात यह है कि जंगल और जंगली जानवरों के बीच होने के बावजूद आज तक किसी श्रद्धालु को कोई नुकसान नहीं हुआ, यह माता की कृपा है।”
नवरात्रि के दौरान हर घर में माता का चौरा स्थापित कर पूजा की जाती है। ज्वारे बोने से लेकर विसर्जन तक मां कोटमहिन को ही सर्वोपरि माना जाता है। मिढुली में भगत और पारंपरिक नृत्य के साथ श्रद्धालु माता की भक्ति में डूबे नजर आते हैं।
