एमपी का ‘नो-गो ज़ोन’ बनते रीवा-सीधी? निरीक्षकों की सूची ने खड़े किए कई अनकहे सवाल

एमपी का ‘नो-गो ज़ोन’ बनते रीवा-सीधी? निरीक्षकों की सूची ने खड़े किए कई अनकहे सवाल

मध्य प्रदेश पुलिस महकमे में हाल ही में तबादलों की जो बयार चली, उसने कई जिलों की तस्वीर बदल दी। पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी 64 निरीक्षकों की सूची सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लग सकती थी—अगर उसमें एक असामान्य सन्नाटा न होता।

यह सन्नाटा है रीवा और सीधी का।

जी हाँ, पूरी सूची में इन दोनों जिलों के नाम जैसे गायब ही हो गए हों।

जहां एक ओर कई जिलों में नए चेहरों की आमद हुई, वहीं रीवा-सीधी इस फेरबदल की पूरी पटकथा से बाहर नजर आए। सवाल उठना लाज़मी है—क्या यह महज संयोग है या किसी बड़ी कहानी की हल्की सी झलक?

कहानी यहीं खत्म नहीं होती…

सूत्रों की मानें तो जो निरीक्षक पहले से इन जिलों में पदस्थ हैं, वे भी अब दूसरे जिलों की ओर रुख करने की कोशिश में हैं। यानी आने वाले तो दूर, जो हैं वो भी जाने को बेताब दिख रहे हैं।

तो आखिर वजह क्या है?

क्या रीवा-सीधी में काम करना वाकई इतना मुश्किल है?

क्या यहां का राजनीतिक दबाव अधिकारियों को पीछे हटने पर मजबूर करता है?

या फिर बल की कमी और लगातार बढ़ता मानसिक दबाव उन्हें इस इलाके से दूरी बनाने को विवश कर रहा है?

या फिर इन सबके पीछे कोई और अनकही परत छुपी है?

इन सवालों के जवाब फिलहाल धुंध में हैं, लेकिन इतना तय है कि यह मामला सिर्फ एक तबादला सूची भर नहीं है—यह उस सिस्टम की झलक है, जहां कुछ जिले ‘पसंदीदा’ बनते हैं और कुछ ‘परहेज़गारी’ की सूची में चले जाते हैं।

रीवा-सीधी के लिए यह स्थिति सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक गंभीर संकेत है—एक ऐसी विडंबना, जिस पर अब सवाल उठने शुरू हो चुके हैं।

अब देखना यह होगा कि यह सन्नाटा कब टूटता है… और इसके पीछे की असली कहानी कब सामने आती

Pragati Pandey

मैं प्रगति पांडे एक फ्रेशर मीडिया जर्नलिस्ट हूं। ट्रैवल बीट पर आर्टिकल्स लिखना मेरी स्पेशलाइजेशन है। इसके अलावा मुझे उन रोचक चीजों के बारे में पढ़ना और लिखना अच्छा लगता है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मैं मास कम्यूनिकेशन से ग्रैजुएट हूं, लिखने के अलावा मुझे एक्टिंग करना और कविताएं लिखना बेहद पसंद है।

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