CWC और JJB के सदस्य राजनीतिक मंच पर… कितना जायज़?

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कुर्सी न्याय की… पट्टा पार्टी का?

‘सफेदपोश’ राजनीति के जाल में बचपन का इंसाफ!

सीधी में संवैधानिक मर्यादा तार-तार, रक्षक ही बने राजनेता!

न्याय की कुर्सी पर बैठकर… राजनीतिक मंच पर माथा?

न्याय का रंग ‘सफेद’… या किसी पार्टी के झंडे जैसा?

क्या अब ‘पार्टी का पट्टा’ तय करेगा बच्चों का भविष्य?

CWC और JJB के सदस्य राजनीतिक मंच पर… कितना जायज़?

सियासत के प्रशिक्षण शिविर में ‘न्याय’… निष्पक्षता पर बड़ा सवाल!

बंद कमरे का इंसाफ… क्या अब नेताओं के इशारे पर होगा?

सीधा सवाल: राजनीति का शौक है, तो कुर्सी क्यों नहीं छोड़ते?

सीधी: “जब अदालत की चौखट पर बैठा शख्स… किसी राजनीतिक दल की चौखट पर माथा टेकने लगे, तो समझ लीजिए कि इंसाफ़ अब ख़तरे में है।”

आज सवाल किसी सरकार का नहीं है, सवाल किसी पार्टी की नीति का भी नहीं है। आज सवाल उस व्यवस्था की ‘आत्मा’ का है, जिसे हम और आप ‘न्याय’ कहते हैं। मध्य प्रदेश के सीधी से आई एक तस्वीर ने आज लोकतंत्र के सबसे संवेदनशील कौने को झकझोर कर रख दिया है। तस्वीरें गवाह हैं कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने वाले, खुद को एक पार्टी के ‘प्रशिक्षण वर्ग’ में समर्पित कर चुके हैं।

सीधे और बेबाक सवाल है:

पहला सवाल: जिस गले में ‘न्याय का तराजू’ होना चाहिए था, वहाँ किसी पार्टी का पट्टा देखकर क्या एक आम पीड़ित परिवार को आपकी निष्पक्षता पर भरोसा होगा?

दूसरा सवाल: जो सदस्य दिन में किसी पार्टी की विचारधारा का ‘ककहरा’ सीख रहे हैं, क्या वो शाम को बंद कमरे में किसी राजनैतिक रसूखदार के खिलाफ जाकर एक बच्चे को न्याय दे पाएंगे?

तीसरा सवाल: क्या हमारी न्याय व्यवस्था इतनी लाचार हो चुकी है कि अब इन बड़े पदों पर बैठने की पहली योग्यता किसी पार्टी का ‘कैर कट्टा’ या कार्यकर्ता होना रह गई है?

सियासत के रंग हज़ारों हो सकते हैं, लेकिन ‘न्याय का रंग’ सिर्फ एक होता है—और वो है ‘बेदाग सफेद’। जब आप उस सफेद चादर पर किसी पार्टी का रंग चढ़ा देते हैं, तो वो न्याय नहीं, विशुद्ध राजनीति बन जाती है……….

——-Juvenile Justice Board और Child Welfare Committee… ये सिर्फ कागज़ पर लिखे दो नाम नहीं हैं। ये वो अदालतें हैं जहाँ समाज के सबसे कमज़ोर, सबसे बेबस और सबसे मजलूम ‘बचपन’ का मुकद्दर तय होता है। एक अनाथ बच्चा, एक पीड़ित बच्ची, या वो किशोर जो रास्ता भटक गया—उसके लिए यह व्यवस्था किसी भगवान से कम नहीं होती। कानून कहता है कि इन कुर्सियों पर बैठने वाले लोग ‘सियासत के कीचड़’ से दूर, पूरी तरह निष्पक्ष और न्यूट्रल होंगे। लेकिन जब इन संवेदनशील निकायों के नुमाइंदे ‘पं. दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण महाअभियान 2026’ जैसे शुद्ध राजनैतिक आयोजनों में अग्रिम पंक्ति में बैठकर ताली बजाते हैं… और गले में पार्टी का पट्टा लटकाते हैं, तो कानून की उस पवित्र मंशा का सरेआम चीरहरण हो जाता है कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है—”न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए।” लेकिन यहाँ तो न्याय किसी पार्टी के दफ़्तर में जाकर घुटने टेकता हुआ दिख रहा है। बात सिर्फ बीजेपी या कांग्रेस की नहीं है, बात उस हर शख्स की है जो इन कुर्सियों की मर्यादा को अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा की सीढ़ी समझता है। हमारा देश के हुक्मरानों और सिस्टम से सिर्फ इतना कहना है—यदि राजनीति का इतना ही शौक है, तो पहले इस पवित्र कुर्सी को आज़ाद कीजिए, इस्तीफा दीजिए और फिर शौक से चुनाव लड़िए। लेकिन ‘न्याय की आड़ में राजनीति’ का यह खेल अब बंद होना चाहिए। सियासत के रंग हज़ारों हो सकते हैं, लेकिन ‘न्याय का रंग’ सिर्फ एक होता है—और वो है ‘बेदाग सफेद’। जब आप उस सफेद चादर पर किसी पार्टी का रंग चढ़ा देते हैं, तो वो न्याय नहीं, विशुद्ध राजनीति बन जाती है……….

—– क्या देश में अब संवैधानिक और अर्ध-न्यायिक कुर्सियों का रंग भी किसी राजनैतिक दल के झंडे से तय होगा?”

यह सवाल आज हर उस नागरिक को पूछना चाहिए जो इस देश के कानून और न्याय व्यवस्था में भरोसा रखता है। मामला मध्य प्रदेश के सीधी जिले का है, लेकिन सवाल पूरे देश की व्यवस्था पर है। जब बच्चों को न्याय देने वाली कुर्सी पर बैठे ज़िम्मेदार लोग, एक राजनीतिक दल के प्रशिक्षण शिविर में पार्टी का पट्टा गले में डालकर अग्रिम पंक्ति में बैठे दिखाई दें… तो क्या उस न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठेंगे? ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए। Juvenile Justice Board (JJB) यानी किशोर न्याय बोर्ड और Child Welfare Committee (CWC) यानी बाल कल्याण समिति… ये कोई आम सरकारी दफ्तर नहीं हैं। ये वो संवेदनशील अर्ध-न्यायिक (Quasi-Judicial) संस्थाएँ हैं, जिन्हें कानून ने भगवान का दर्जा दिया है—उन बच्चों के लिए जो अनाथ हैं, जो पीड़ित हैं, या जो भटककर अपराध की दुनिया में कदम रख चुके हैं। इन कुर्सियों पर बैठे लोगों का एक फैसला, किसी बच्चे की पूरी ज़िंदगी बना सकता है या बिगाड़ सकता है। इसीलिए कानून की मंशा बहुत साफ है—इन पदों पर बैठे लोगों को राजनीति से कोसों दूर, पूरी तरह तटस्थ और निष्पक्ष होना चाहिए।

Pragati Pandey

मैं प्रगति पांडे एक फ्रेशर मीडिया जर्नलिस्ट हूं। ट्रैवल बीट पर आर्टिकल्स लिखना मेरी स्पेशलाइजेशन है। इसके अलावा मुझे उन रोचक चीजों के बारे में पढ़ना और लिखना अच्छा लगता है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मैं मास कम्यूनिकेशन से ग्रैजुएट हूं, लिखने के अलावा मुझे एक्टिंग करना और कविताएं लिखना बेहद पसंद है।

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