खंभे खड़े, तार बिछे, फिर भी अंधेरे में गांव, वन विभाग की एनओसी ने छीन ली 300 परिवारों की रोशनी

खंभे खड़े, तार बिछे, फिर भी अंधेरे में गांव, वन विभाग की एनओसी ने छीन ली 300 परिवारों की रोशनी
उमरिया तपस गुप्ता (7999276090)
एक ओर देश डिजिटल इंडिया, स्मार्ट विलेज और हर घर बिजली जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के जरिए गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का दावा कर रहा है, वहीं उमरिया जिले के पाली जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत कठई के सास और चिनकी गांव आज भी अंधेरे में जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। यहां वर्षों पहले बिजली पहुंचाने के लिए लगाए गए खंभे और तार ग्रामीणों को रोज विकास के अधूरे वादों की याद दिलाते हैं, लेकिन वन विभाग की एनओसी के अभाव में आज तक गांव में बिजली नहीं पहुंच सकी।
जानकारी के अनुसार सास और चिनकी गांव में करीब 250 से 300 परिवार निवास करते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि बिजली लाइन विस्तार का कार्य कई वर्ष पहले शुरू किया गया था। कुछ स्थानों पर खंभे और तार भी लगाए गए, लेकिन वन क्षेत्र से गुजरने वाली लाइन के लिए आवश्यक अनुमति न मिलने के कारण कार्य बीच में ही रोक दिया गया। तब से लेकर आज तक गांव के लोग बिजली का इंतजार कर रहे हैं।
सबसे हैरानी की बात यह है कि जिस दौर में गांव-गांव तक इंटरनेट, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की बात की जा रही है, उस दौर में सास और चिनकी के बच्चे शाम ढलते ही अंधेरे से जूझने लगते हैं। कई छात्र मोबाइल की टॉर्च, लालटेन या ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। मोबाइल फोन चार्ज करना भी ग्रामीणों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। कई लोगों को इसके लिए दूसरे गांवों का सहारा लेना पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि बिजली के अभाव में न केवल शिक्षा प्रभावित हो रही है, बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी परेशानी हो रही है। आज अधिकांश सेवाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं, लेकिन बिजली न होने के कारण डिजिटल सुविधाएं इन गांवों तक नहीं पहुंच पा रही हैं।
ग्राम पंचायत सचिव राजेश यादव ने बताया कि पंचायत स्तर पर आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। उन्होंने कहा कि पंचायत के खाते में कार्य के लिए राशि भी उपलब्ध है और जैसे ही वन विभाग से एनओसी प्राप्त होगी, शेष कार्य पूरा कर गांवों में बिजली पहुंचाई जा सकती है। सचिव के अनुसार मुख्य बाधा केवल वन विभाग की अनुमति है।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग में एनओसी के लिए फाइल लगभग एक वर्ष से लंबित है, लेकिन अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते अनुमति जारी कर दी जाती, तो आज सैकड़ों परिवार अंधेरे में रहने को मजबूर नहीं होते।
इस मामले में वन विभाग का पक्ष जानने के लिए संबंधित रेंजर सचिन कांत से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। ऐसे में विभाग की ओर से यह स्पष्ट नहीं हो सका कि एनओसी जारी करने में आखिर इतनी देरी क्यों हो रही है और फाइल किस स्तर पर लंबित है।
अब बड़ा सवाल यह है कि जब बिजली के लिए आवश्यक धनराशि उपलब्ध है, खंभे और तार वर्षों पहले लगाए जा चुके हैं और ग्रामीण लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं, तो आखिर वन विभाग की अनुमति मिलने में इतना विलंब क्यों हो रहा है। क्या विभागीय उदासीनता के कारण सैकड़ों ग्रामीणों को विकास की रोशनी से वंचित रखा जा रहा है।
सास और चिनकी के ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन और वन विभाग इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करें और लंबित एनओसी जारी कर बिजली व्यवस्था बहाल कराएं। क्योंकि डिजिटल युग में भी यदि कोई गांव बिजली जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है, तो यह केवल विकास के दावों पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। ग्रामीणों को अब आश्वासनों नहीं, बल्कि अपने घरों में जलते हुए बल्बों का इंतजार है।
